August 30, 2026 6:34 PM

सरकारी स्कूलों के संकट पर यशपाल आर्य का सरकार पर हमला, कहा – 5 हज़ार स्कूल बंद होने कगार पर

देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी विद्यालयों में लगातार घटती छात्र संख्या को लेकर नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने प्रदेश सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में करीब 5 हजार सरकारी प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूल ऐसे हैं, जहां छात्र संख्या 10 या उससे कम रह गई है। इनमें करीब 4,275 प्राथमिक विद्यालय और 650 जूनियर हाईस्कूल शामिल हैं। कुछ विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या महज एक, तीन या चार तक रह गई है।

यशपाल आर्य ने कहा कि करीब 12 हजार करोड़ रुपये के वार्षिक शिक्षा बजट के बावजूद सरकारी विद्यालयों की यह स्थिति गंभीर सवाल खड़े करती है। उन्होंने सरकार से पूछा कि जब सरकारी स्कूल लगातार विद्यार्थियों से खाली हो रहे हैं तो शिक्षा की गुणवत्ता और नामांकन बढ़ाने के दावों का हिसाब जनता को कब दिया जाएगा।

उन्होंने कहा कि कम छात्र संख्या केवल विद्यार्थियों का आंकड़ा नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा नीति, शिक्षक उपलब्धता, विद्यालय प्रबंधन और आधारभूत सुविधाओं की स्थिति पर भी सवाल है। सरकार को बताना चाहिए कि कितने विद्यालयों में स्वीकृत पदों के मुकाबले शिक्षक कम हैं और कितने विद्यालय भवन, शौचालय, पेयजल, बिजली, प्रयोगशाला व डिजिटल सुविधाओं से वंचित हैं।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि यदि विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक, सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध नहीं होगी तो अभिभावक निजी विद्यालयों की ओर जाएंगे। इसके बाद कम नामांकन को स्कूल बंद करने का आधार बनाना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि समस्या से पलायन होगा।

30 दिन में जानकारी सार्वजनिक करने की मांग

यशपाल आर्य ने सरकार से 30 दिनों के भीतर प्रदेश के प्रत्येक सरकारी विद्यालय की छात्र संख्या की जिला और विद्यालयवार सूची सार्वजनिक करने की मांग की। साथ ही 10 या उससे कम विद्यार्थियों वाले विद्यालयों की सूची, पिछले पांच वर्षों में बंद या विलय किए गए विद्यालयों का विवरण, स्वीकृत और कार्यरत शिक्षकों की संख्या तथा जर्जर भवनों और बुनियादी सुविधाओं से वंचित विद्यालयों की जानकारी सार्वजनिक करने को कहा।

उन्होंने पिछले पांच वर्षों में नामांकन बढ़ाने पर खर्च की गई राशि और उसके परिणाम का ब्यौरा देने, गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए गए शिक्षकों की जानकारी और कम नामांकन वाले विद्यालयों के लिए विद्यालयवार पुनर्जीवन योजना सार्वजनिक करने की भी मांग की।

उन्होंने कहा कि स्कूल बंद या विलय करने के लिए अपनाए जाने वाले मानकों और प्रक्रिया को भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। प्रत्येक बंद अथवा विलय प्रस्ताव से पहले संबंधित ग्रामसभा, अभिभावकों और स्थानीय समुदाय की राय लेने की व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए।

‘स्कूल बंद करने से पहले स्कूल बचाने की नीति बनाए सरकार’

यशपाल आर्य ने कहा कि सरकारी विद्यालय गरीब, ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों की शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। पर्वतीय उत्तराखंड में विद्यालय केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि गांव के सामाजिक अस्तित्व का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

उन्होंने मांग की कि सरकार स्कूल बंद करने से पहले स्कूल बचाने की नीति घोषित करे। कम नामांकन वाले प्रत्येक विद्यालय के लिए विशेष पुनर्जीवन योजना बनाई जाए, पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराए जाएं और जर्जर भवनों व मूलभूत सुविधाओं में समयबद्ध सुधार किया जाए।

उन्होंने कहा कि नामांकन बढ़ाने की योजनाओं का स्वतंत्र मूल्यांकन और शिक्षा बजट के खर्च व परिणाम का सार्वजनिक सामाजिक अंकेक्षण कराया जाना चाहिए। स्कूल बंद या विलय करने से पहले अभिभावकों और ग्राम समुदाय को विश्वास में लेना जरूरी है।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि जनता के पैसे से चलने वाले विद्यालय जनता के बच्चों के लिए हैं। सरकार की जिम्मेदारी बच्चों को विद्यालय तक पहुंचाना है, न कि बच्चों की संख्या घटने के बाद विद्यालयों को ही खत्म कर देना। उन्होंने कहा कि अब सरकार को केवल बयान नहीं, बल्कि आंकड़ों का पूरा हिसाब देना होगा और यदि शिक्षा नीति विफल हुई है तो जिम्मेदारी भी तय करनी होगी।