September 30, 2026 6:24 PM

उत्तराखंड: नीट काउंसलिंग में आरक्षित सीटों के आवंटन पर सवाल उठाते हुए  नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने की उच्चस्तरीय जांच की मांग

yashpal

देहरादून। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने उत्तराखंड में नीट-यूजी 2026 की काउंसलिंग प्रक्रिया में आरक्षित वर्गों की सीटों के आवंटन को लेकर सामने आई शिकायतों पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा कि यदि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और अन्य आरक्षित श्रेणियों का लाभ ऐसे अभ्यर्थियों को मिला है, जो निर्धारित पात्रता पूरी नहीं करते, तो यह वास्तविक पात्र अभ्यर्थियों के साथ गंभीर अन्याय होगा।

यशपाल आर्य ने कहा कि केवल छोटे कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई कर मामले की खानापूर्ति नहीं की जानी चाहिए। पूरी काउंसलिंग प्रक्रिया की जिम्मेदारी तय करने के साथ संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तराखंड चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय, देहरादून की ओर से संचालित नीट-यूजी काउंसलिंग के प्रथम चरण की सूची को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। शिकायत के अनुसार प्रथम चरण की सूची में क्रम संख्या 684 पर दिपांशु और क्रम संख्या 745 पर कुसुम मल को अनुसूचित जाति श्रेणी के तहत सीट आवंटित किए जाने का उल्लेख है, जबकि शिकायतकर्ता के अनुसार दोनों सामान्य श्रेणी से संबंधित हैं।

इसी तरह क्रम संख्या 820 पर प्रियांशु गुप्ता और क्रम संख्या 825 पर हर्षित को अनुसूचित जाति श्रेणी की सीट आवंटित किए जाने का उल्लेख है, जबकि उपलब्ध शिकायत के अनुसार दोनों अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी से संबंधित हैं। वहीं क्रम संख्या 951 पर चित्रा, जिन्हें सामान्य-आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग श्रेणी का बताया गया है, को भी अनुसूचित जाति श्रेणी की सीट आवंटित किए जाने का आरोप लगाया गया है।

आर्य ने कहा कि इन पांचों मामलों के साथ ही ऐसे सभी मामलों की जांच जरूरी है। किसी अभ्यर्थी को गलत तरीके से आरक्षित श्रेणी का लाभ मिला है या नहीं, इसका अंतिम निर्धारण सक्षम सरकारी प्राधिकरण की ओर से मूल जाति प्रमाणपत्र, स्थायी निवास प्रमाणपत्र और अन्य संबंधित अभिलेखों के सत्यापन के बाद ही किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि राउंड-1 और राउंड-2 के बाद बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों के प्रवेश अथवा सीट छोड़कर अगली पसंद की सीट के लिए प्रक्रिया में बने रहने से संबंधित अस्थायी सूची जारी हुई है। ऐसे में श्रेणी और स्थायी निवास से जुड़े प्रमाणपत्रों के सत्यापन की आवश्यकता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि गुजरात, मध्य प्रदेश, चंडीगढ़, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार अथवा अन्य राज्यों से आए अभ्यर्थियों को केवल दूसरे राज्य का होने के आधार पर दोषी नहीं माना जा सकता। लेकिन जिस अभ्यर्थी ने उत्तराखंड के आरक्षण अथवा स्थायी निवास का लाभ लिया है, उसके प्रमाणपत्रों की वैधानिकता और पात्रता की पूरी जांच होना जरूरी है।

उन्होंने मांग की कि राउंड-1 और राउंड-2 में आरक्षित श्रेणी अथवा स्थायी निवास के आधार पर सीट प्राप्त करने वाले सभी अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों का भौतिक और डिजिटल सत्यापन कराया जाए। संदिग्ध जाति और स्थायी निवास प्रमाणपत्रों को संबंधित जिलाधिकारी अथवा सक्षम प्राधिकारी के माध्यम से सत्यापित कराया जाए।

आर्य ने कहा कि गलत प्रमाणपत्र पाए जाने पर संबंधित अभ्यर्थी का प्रवेश नियमानुसार निरस्त किया जाए और कानून के तहत कार्रवाई की जाए। इसके साथ ही हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तराखंड चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय तथा काउंसलिंग प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच हो।

उन्होंने यह भी मांग की कि यदि प्रमाणपत्र जारी करने, सत्यापन करने अथवा सीट आवंटित करने में किसी स्तर पर जानबूझकर अनियमितता सामने आती है तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए। आरक्षित सीटों के आवंटन से जुड़ी शिकायतों की स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और जांच की स्थिति तथा कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक की जाए।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि प्रमाणपत्र सत्यापन की प्रक्रिया पूरी किए बिना अगली काउंसलिंग प्रक्रिया आगे बढ़ाने से पहले सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के मेधावी और वास्तविक रूप से पात्र युवाओं के अधिकारों की कीमत पर किसी भी प्रकार की अनियमितता स्वीकार नहीं की जा सकती।

उन्होंने कहा कि चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों का पूरी तरह पालन होना चाहिए। सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि इस मामले में अब तक किन अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है। यदि पूर्व वर्षों की काउंसलिंग में भी ऐसी अनियमितताओं की शिकायतें सामने आई हैं तो उनके अभिलेखों की भी जांच की जानी चाहिए।

आर्य ने कहा कि सरकार को इस मामले में अपनी जिम्मेदारी से बचने के बजाय निष्पक्ष जांच कराकर जिम्मेदारी तय करनी चाहिए और पात्र उत्तराखंड के युवाओं के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।